वैदिक सन्ध्या

The Daily Practice of Brahma Yajna

गायत्री मन्त्र

ऋग्वेद मण्डल ३, सूक्त ६२, मन्त्र १०; यजुर्वेद ३६.३

ओ३म् भूर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।

धियो यो न: प्रचोदयात् ।।

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आचमन मन्त्र

ऋग्वेद १०.९.४, यजुर्वेद ३६.१२

Note: निम्नलिखित मन्त्र का एक बार उच्चारण करके दायीं हथेली में जल लेकर तीन आचमन करें।

ओ३म्। शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।

शंयोरभि स्रवन्तु न: ।।

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अङ्गस्पर्श मन्त्र

Note: बायीं हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की मध्यमा और अनामिका से स्पर्श करें।

ओ३म् वाक् वाक्। (मुख)

ओ३म् प्राण: प्राण:। (नासिक)

ओ३म् चक्षुश्चक्षु:। (नेत्र)

ओ३म् श्रोत्रम् श्रोत्रम्। (कर्ण)

ओ३म् नाभि:।

ओ३म् हृदयम्।

ओ३म् कण्ठ:।

ओ३म् शिर:।

ओ३म् बाहुभ्यां यशोबलम्। (भुजायें)

ओ३म् करतल करपृष्ठे ।। (हथेलियाँ)

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मार्जन मन्त्र

Note: जल छिड़कें और पवित्रता की कामना करें।

ओ३म् भू: पुनातु शिरसि।

ओ३म् भुव: पुनातु नेत्रयो:।

ओ३म् स्व: पुनातु कण्ठे।

ओ३म् मह: पुनातु हृदये।

ओ३म् जन: पुनातु नाभ्याम्।

ओ३म् तप: पुनातु पादयो:।

ओ३म् सत्यं पुनातु पुन: शिरसि।

ओ३म् खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र।।

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प्राणायाम मन्त्र

तैत्तिरीय आरण्यक १०.२७

Note: इस मन्त्र से तीन प्राणायाम करें।

ओ३म् भू:। ओ३म् भुव:। ओ३म् स्व:। ओ३म् मह:।

ओ३म् जन:। ओ३म् तप:। ओ३म् सत्यम् ।।

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अघमर्षण मन्त्र

ऋग्वेद १०.१९०.१-३

Note: पाप नाश की कामना करते हुए ईश्वर के न्यायकारी स्वरूप का ध्यान करें।

ओ३म्। ऋतञ्च सत्यंचाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत।

ततो रात्र्यजायत तत: समुद्रो अर्णव: ।।१।।

ओ३म्। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत।

अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी ।।२।।

ओ३म्। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथा पूर्वमकल्पयत्।

दिवञ्च पृथिवीञ्चान्तरिक्षमथो स्व: ।।३।।

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मनसा परिक्रमा (पूर्व)

अथर्व ३.२७.१

ओ३म्। प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।१।।

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मनसा परिक्रमा (दक्षिण)

अथर्व ३.२७.२

ओ३म्। दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।२।।

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मनसा परिक्रमा (पश्चिम)

अथर्व ३.२७.३

ओ३म्। प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपति: पृदाकू रक्षितान्नमिषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।३।।

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मनसा परिक्रमा (उत्तर)

अथर्व ३.२७.४

ओ३म्। उदीची दिक् सोमोऽधिपति: स्वजो रक्षिताशनिरिषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।४।।

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मनसा परिक्रमा (ध्रुवा/नीचे)

अथर्व ३.२७.५

ओ३म्। ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपति: कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।५।।

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मनसा परिक्रमा (ऊर्ध्वा/ऊपर)

अथर्व ३.२७.६

ओ३म्। ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपति: श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषव:।

तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु।

यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म: ।।६।।

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उपस्थान मन्त्र (१)

यजुर्वेद ३५.१४

Note: ईश्वर को समीप अनुभव करते हुए।

ओ३म्। उद्वयं तमसस्परि स्व: पश्यन्त उत्तरम्।

देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ।।१।।

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उपस्थान मन्त्र (२)

यजुर्वेद ३३.३१

ओ३म्। उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:।

दृशे विश्वाय सूर्यम् ।।२।।

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उपस्थान मन्त्र (३)

यजुर्वेद ७.४२

ओ३म्। चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने:।

आप्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षgw सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा ।।३।।

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उपस्थान मन्त्र (४)

यजुर्वेद ३६.२४

ओ३म्। तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरद: शतं

जीवेम शरद: शतं श्रृणुयाम शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतं

अदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात् ।।४।।

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समर्पण मन्त्र

हे ईश्वर दयानिधे! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा,

धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्य: सिद्धिर्भवेन्न: ।।

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नमस्कार मन्त्र

यजुर्वेद १६.४१

ओ३म्। नम: शम्भवाय च मयोभवाय च। नम: शङ्कराय च

मयस्कराय च। नम: शिवाय च शिवतराय च ।।

ओ३म् शान्ति: शान्ति: शान्ति:।

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